Showing posts with label प्रतिबिम्ब. Show all posts
Showing posts with label प्रतिबिम्ब. Show all posts

Apr 13, 2010

चेहरा



हँसतें-हँसतें
रोने का
अंदाजे बयां भी देखा
रोते-रोते
हँसने का
अंदाजे बयां भी देखा
और
इन दोनों के बीच
असमंजस से घिरा
वो
मंजर भी देखा
उस चेहरे का
जो
खुद-खुद पे
संवर जाता है
अपनी ही
हंसी के दायरे में
खुद-खुद पे
भिखर जाता है
अपने ही
आंसुओं के पैमाने में
सच
क्या कहूँ
इस नक्शे कदम का
जिसका अक्स
उभरता है
उस चेहरे पे
जो
दिन-प्रतिदिन
ओर भी
प्यारा-प्यारा सा
लगता है !

Mar 26, 2010

ऐ दोस्त


क्यों
खफा -खफा सा रहता है
क्यों
बुझा-बुझा सा रहता है

दोस्त
जरा सर को झुकाकर
नजरों को
दिल के आइने पे डाल
हमारा ही न मिटने वाला
अमिट प्रतिबिम्ब दिखाई देगा
और
फिर नम आखों से
झरते असूंओं के मोतिओं में
ओस की
बूंद सा नजर आऊंगा

दोस्त !

Aug 17, 2007

प्रतिबिम्ब


कैसी ये विडम्बना है
सिरहाने खड़े होकर
देखता हूँ मैं
स्वयम को ही
सोता हुआ
और
बनती बिगड़ती हुयी
आकृतियाँ चहरे की
जो शायद स्वप्निल अवस्था में
देखे हुये द्रश्यों की
प्रतिक्रिया मात्र थी।
खुलते ही आंख
भ्रम का आवरण छिन्न हुआ
वह तो प्रतिबिम्ब था
मेरी ही आकृति का
जो खड़े होकर अपने ही सिरहाने
अपने ही रूप को
सोते में देखता था।