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Mar 31, 2010

अलविदा


वो आए तो थे
महफ़िल में
मगर
कुछ उदास-उदास से
कुछ सिमटे-सिमटे से
फिर
पुकार कर दूर से ही
कुछ सोचकर
कहकर अलविदा
चल दिए
और
दे गए तनहाइयों में
बेबसी के
टूटे हुए पत्थरों से
बना
यादों का खंडहर !

Mar 9, 2010

अभिलाषा


क्या बताऊँ यार
क्यों
अक्सर खो जाता हूँ
मैं
गुम सुम सा होकर
मुख पे
शून्य का भाव लिए
अतीत में !
काफी अरसे से
कुछ कर
गुजरने की तमन्ना है
दिल में
कुछ कर गुजरना है
मुझे
अपने आप को
हिमालय के शिखर तक
ऊँचा उठाने के लिए
और
अपने नाम के शब्दों को
सुबह की
सूर्य की
किरणों से
जोड़ने के लिए
कभी -कभी
जब आता है ध्यान
कम है जिन्दगी
सफ़र है लम्बा
अब
कुछ कर गुजरना ही चाहिए
मुझको
पर
भटक जाता हूँ अक्सर
चलता हुआ
जीवन की
इस लम्बी सी
टेढ़ी मेढ़ी डगर पर
भटकने के साथ -साथ
अटक भी जाता हूँ
जब कभी
मजबूर हो जाता हूँ
फिर
मुख मोड़ कर्तव्य से
खो जाता हूँ
सपनों की दुनिया में
तब ओर भी
मायूस हो जाता हूँ
जब
सपनों के शहर में
खोकर भी
पाता हूँ
अपनी तमन्ना की परछाई का
अक्स
खंडहर का रूप लिए !

Feb 14, 2008

मासूम कलियाँ


सुबह की लालिमा को भी देखा
रात के सन्नाटे को भी देखा
धूप में अपने साए को भी साथ-साथ चलते देखा
छांव में अपने साए को भी विलुप्त होते देखा
सुख में अपनों को भी साथ-साथ देखा
दुख में अपनों को भी पराए होते देखा
जीवन में अच्छाइयों को भी अपना कर देखा
जीवन में बुराइयों को भी अपना कर देखा
जिन्दगी को हर हालात में भी जीकर देखा
जिन्दगी में ना चाहते हुए भी मौत का मजंर भी देखा
पर
इन सब के बीच
मानव की मानवता को भी खडंहर होते देखा
उस खंडहर में
उस मजंर को भी देखा
जो
आतंक के साए से भी ज्यादा भयानक था
गरीब में भुख के साए से भी ज्यादा दर्दनाक था
वो था
मासूम बच्चों के कंकालों का ढेर