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Apr 12, 2010

गुडिया


गुडिया

गुडिया
बड़ी होकर
बनेगी तू दुल्हनिया
आंसू बहाएगी तब संग
बचपन की सेहलिया
चेहरे पर जब
पड़ेंगी झुरियां
हो जाएगी
तब
तू बुढिया
आकर तंग
बुढ़ापे से
जाएगी मर
खाकर जहर की पुडिया
रोयेंगे फिर
सिर्फ
गम में तेरे
पोते पोतियाँ
अंत में
ले जाकर
शमशान में
कर डालेंगे
क्रिया-क्रम
तेरा !

Apr 8, 2010

जीवन का मोल


आजकल
खेल के
मैदान में
शराब
और
शवाब
का भी
चल रहा है
खूब खेल
टिकटों की
सेल में भी
धडल्ले से चल रहा है
ब्लैकमेल
नेता और अभिनेता भी
बढ-चढ़कर
प्ले कर रहे है
अपना रोल
तोल-तोल के
बोल-बोल के
खिलाडियों का
लगा रहे है
करोडों का मोल
इसी में इनको
नज़र
आ रहा है
अपने
अनमोल जीवन का
मोल
खेलों के
नाम पर
फल-फूल रहा है
ये
अंधेरगर्दी का
खेल
जिस देश में
अनगिनत लोग़
भूख और गरीबी की
मार रहे है
झेल
बेचकर
खून अपना
कुछ पल जीकर
देख रहे है
जिन्दगी का
खेल !



Apr 6, 2010

रिश्ते


पैसे

पैसे
तुने
अपना लिया है
रूप ये कैसा
तेरी खनक में
दब के रह गई है
माँ-बाप
भाई-बहन
के
रिश्तों की
चीख
और
पुकार !

Apr 5, 2010

आंगन


अन्धकार को
चीरती हुई
जब सुबह
सूर्य की
पहली किरण के साथ
मन के
आंगन में उतरती है
तब
मन के आंगन में
विचारों के
नये अंकुर फूटने लगते है
सपनों की
कलियाँ खिलने लगती है
प्रतिदिन
कुछ ऐसी ही
प्रतिक्रिया अनुभव होती है
परन्तु
साँझ होते-होते
सूर्य की
अन्तिम किरण के साथ-साथ
अंकुरों का
अपना कोई रूप नही रह जाता
सपनों की
कलियाँ
टूट-टूट कर
भिखरने लगती है
और
मन के आंगन के
गहन अन्धकार में
निराशा के
तारे
टिमटिमाने लगते है !

Oct 1, 2007

पथ निर्माण


बता रही है ए श्रमिक
तेरे श्रम की दास्तां
एक छोटी सी
बेजुबां खामोश चिमनी भी
तेरे ही खून का बनकर पसीना
जो झर रहा है
तेरी देह से झरना बनकर
निकल रहा है
मेरे मुख से वाष्प बनकर
फिर भी तू वचिंत है
जीवन की मधुर मुस्कान से
तन का दीया
मन की बाती बनाकर
प्रकाश फैला दिया कारखानों में
फिर भी,
तू है अन्धकार में !
देश का गौरव बढ रहा है
तेरे ही मेहनत के चमत्कार से
फिर भी तू वचिंत है
अपने ही अधिकारों से !
मानवता का संदेश
बापू का
मिलता नज़र आ रहा है
धूल में
हनन करके अधिकारों का
धनवानों ने
मजबूर कर दिया
अनशन,हड़ताल और तालाबंदी पर !
देखकर
इस विड़म्बना को
ख्याल आता है
मन में
अपने लक्ष्य के साथ-साथ
जब तक
आवागमन चलता रहे
सासों का
निर्माण करुँ
एक एसे पथ का
जो
मानवता के संदेश से
उजागर हो
और
चले इस पर जब
दो रंगी ये दुनिया
मिल मालिक हो या मजदूर
अमीर हो या गरीब
बाँट ले आपस में मिलकर
सुख-दुख की
लहरों का संगम !

Sep 11, 2007

उम्मीद


गिर -गिर कर सम्भलता हुआ
सम्भल -सम्भल कर गिरता हुआ
आशा और निराशा की
धुप -छावं में भटकता हुआ
उम्मीदों का काफिला संजोता हुआ
जीवन की डगर पर चलता हुआ
चला जा रहा था राही
मंजिल की तरफ बढता हुआ
चलते -चलते शाम ढले
जब नजर ना आया
निशा मंजिल का
तब बैठ गया
आशा और निराशा की
कशमकश से थक्कर
मंजिल की उम्मीद छोडकर
शाम ढले
पेड की शाख तले
शाम ढली
ढलकर अंधकार में बढ़ी
और
रात बढ़ी
जैसे -जैसे रात बढ़ी
राही की चिन्ता भी बढ़ी
विचारों का काफिला
बढ़ चला मस्तिष्क में
क्या सोचकर चला था
क्या हो रहा है
शायद
इसी को उम्मीदों का टूटना ..............
और
ले गया राही को
भावनाओं के सागर में
समझाता हुआ
परिभाषा भाग्य की
कुछ सोच ही रहा था राही
कि तभी
अंधेरे में कुछ टिमटिमाता दिखा
ध्यान से देखा
पाया जुगनू है
धीरे से आत्मा ने कहा
अब भी तू नही समझा
है जिस तरह
यह छोटा पतंगा
गहन अन्धकार में
है उसी तरह
प्रत्येक जीव की स्थिति संसार में
निराश ना हो
दीप उम्मीद का
जलाए हुए मन में
बढ़ चल
मंजिल की तरफ़
वरना ए राही
वीरान चमन बन कर
रह जायगा
यह तेरा
अनमोल जीवन !